ईद का दिन था सुबह सुबह किसी ने टोका “ईद मुबारक हो!” मैंने कहा “आपको भी ईद मुबारक हो!” सवाल हुआ “नमाज़ पढ़ने नहीं गए, लेकिन स्वीमिंग करने जा रहे हो!” मैंने कहा “हाँ, मैं नहीं गया क्यूँकि मैं नाराज़ हूँ उस ख़ुदा से जो ये दुनिया बना के भूल गया है जो कहीं खो गया है या शायद सो गया है या जिसकी आँखें फूट गई हैं जिसे कुछ दिखाई नहीं देता कि उसकी बनायी हुई इस दुनिया में क्या क्या हो रहा है!” “हाँ, मैं नाराज़ हूँ और तब तक मस्जिद में क़दम नहीं रखूँगा जब तक आयलन कुर्दी फिर से ज़िन्दा नहीं होता जब तक दिल्ली की वो दो लड़कियाँ सही सलामत वापस नहीं आतीं जिन्हें जलते हुए तारकोल के ड्रम में सिर्फ़ इसलिए डाला गया था क्यूँकि वो मुसलमान थीं और हाँ, मुझे उनके चेहरे पे कोई दाग़ नहीं चाहिए” “मैं नाराज़ हूँ और तब तक मस्जिद में क़दम न रखूँगा जब तक हरप्रीत कौर और हर पंजाबन औरत और बच्ची बिना ख़ंजर लिए सुकून से नहीं सोती जब तक दंगों में गुम मंटो की शरीफ़न अपने बाप क़ासिम को मिल नहीं जाती तब तक मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा” “मुझे तुम्हारे क़ुरआन पे पूरा भरोसा है बस उसमें से ये जहन्नुम का डर निकाल दो ये डर की इबादत भी भला कोई इबादत है? कैसा होता कि मैं अपनी ख़ुशी से जब चाहे मस्जिद में आता और एक रकअत में ही गहरी नींद और तेरी गोद में सो जाता!” “मुझे तुमसे शिकायत है एक सेब खाने की आदम को इतनी बड़ी सज़ा? तुम्हें शरम नहीं आती? तुम्हारा कलेजा नहीं पसीजता?” “यहाँ तुम्हारे मौलवी मस्जिद की तामीर के लिए कमीशन पे चन्दा इकट्ठा कर रहे हैं जहाँ ग़रीबों को दो रोटी नसीब नहीं वहाँ मूर्तियों पे करोड़ों रुपए पानी की तरह बह रहे हैं तुम्हारे नाम पे यहाँ रोज़ जाने कितने मर रहे हैं” “तुम्हें पता भी है कुछ? लोग पाकिस्तान को इस्लामिक देश कहते हैं तुम्हें हँसी नहीं आती? और तुम्हें शरम भी नहीं आती? तुम्हारी मासूम बच्चियों को पढ़ने से रोका जाता है कोई सर उठाए तो उन्हें गोली भी मार देते हैं तुमने एक मलाला को बचा लिया तो ज़्यादा ख़ुश न होओ” “तुम्हारे आँसू नहीं बहते? जब किसी बोहरी लड़की का ज़बर्दस्ती ख़तना किया जाता है! क्या तुम्हें उन मासूम लड़कियों की चीख़ सुनाई नहीं देती?” “या तो तुम बहरे हो गए हो या तुम्हारे कान ही नहीं हैं या फिर तुम ही नहीं हो” “तुम तो कहते हो तुम ज़र्रे-ज़र्रे में हो! फिर जब कोई मंसूर अनल-हक़ कहता है तब उसकी ज़बान काट क्यूँ ली जाती है?” “क्या उस कटी ज़बान से टपके ख़ून में तुम नहीं थे? क्या मंसूर की उन चमकती आँखों में तुम उस वक़्त मौजूद नहीं थे? जो तुम्हारी आँखों के सामने फोड़ दी गईं?” “क्या मंसूर के उन हाथों में तुम नहीं थे, जो काट दिए गए? क्या मंसूर के पैर कटते ही तुम भी अपाहिज हो गए?” “आओ, आके देखो अपनी दुनिया का हाल आबादी बहुत बढ़ चुकी है अब सिर्फ़ एक मुहम्मद से काम नहीं चलेगा तुम्हें पैग़म्बरों की पूरी फ़ौज भेजनी होगी क्यूँकि मूसा तो यहूदियों के हो गए और ईसा को ईसाइयों ने हथिया लिया दाऊद बोहरी हो गए बुद्ध का अपना ही एक संघ है महावीर, जो एक चींटी भी मारने से डरते थे उस देश में इन्सान की लाश के टुकड़े काग़ज़ की तरह बिखरे मिलते हैं” “जाने कितने दीन धरम मनगढ़ंत हैं श्‍वेताम्बर, दिगम्बर, जाने कितने पंथ हैं आदम की औलाद सब, जाने कैसे बिखर गए तुम्हारे सब पैग़म्बरों के टुकड़े-टुकड़े हो गए” “तुम तो मुहम्मद की इबादत में बहे आँसुओं से ख़ुश हो लिए मगर क्या तुम्हें ये सूखी धरती दिखाई नहीं देती? ये किसान दिखाई नहीं देते?” “तेरी दुनिया में आज अनाज पैदा करने वाले ही भूखे मरते हैं मुझे हँसी आती है तेरे निज़ाम पर और तू मुझे जहन्नुम का डर दिखाता है?” “जा, मैं नहीं डरता तेरी दोज़ख़ की आग से यहाँ ज़िन्दगी कौन सी जहन्नुम से कम है! पीने का पानी तक तो पैसे में बिकता है!” “तू पहले हिन्दुस्तान की औरतों को मस्जिद में जाने की इजाज़त दिला तू पहले अपने मुल्ला-मौलवियों को समझा कि लोगों को इस तरह गुमराह न करें तीन बार तलाक़ कह देने से ही तलाक़ नहीं होता!” “तू आके देख मदरसों में मासूम बच्चों को क़ुरआन पढ़ाया नहीं, रटाया जाता है फिर इन्हीं रटंतु तोतों को हाफ़िज़ बनाया जाता है जो तेरी बा-कमाल आयतों को तोड़-मरोड़ कर अपने फ़ाएदे के लिए इस्तेमाल करते हैं” “मैं किस मस्जिद में जाऊँ? तू तो मुझे वहाँ मिलता नहीं! और तेरे दर, काबा आने के इतने पैसे लगते हैं! जहाँ हर साल भगदड़ होती है और न जाने कितने ही बेवक़ूफ़ मरते हैं!” “मैं कहता हूँ इतनी भीड़ में जाने की ज़रूरत क्या है? कितना अच्छा होता कि मैं मक्का पैदल आता! और तू मुझे वहाँ अकेला मिलता!” “तू पहले ये सरहदें हटा दे ये क्या बात हुई कि तेरे काबा पे अब सिर्फ़ कुछ शेख़ों का हक़ है?” “तू पहले समझा उन पागलों को कि तुझे सोने के तारों से बुनी चादर नहीं चाहिए! मैं तब आऊँगा वहाँ अभी तेरी मस्जिद में आने का दिल नहीं करता! जानता है क्यूँ?” “अँधेरी ईस्ट की साईं गली वाली मस्जिद के बाहर एक मासूम सी लड़की आँखों में उम्मीद लिए और हाथ फैलाए हुए भीख माँगती है मैं उसे पाँच रुपये देने से पहले सोचता हूँ कि इसकी आदत ख़राब हो जाएगी! फिर ये इसी तरह भीख माँगती रह जाएगी अगर मैं उससे थोड़ी हमदर्दी दिखाऊँ तो लोगों की नज़र में, मेरी नज़र ख़राब है मैं उसे अपने घर भी ला नहीं सकता कुछ तो घर वाले लाने नहीं देंगे और कुछ तो उसके मालिक भी” “हाँ, शायद तुम्हें किसी ने बताया नहीं होगा हिन्दुस्तान में बच्चों से भीख मँगवाने का बा-क़ाएदा कारोबार चलता है मासूम बच्चों को पहले अगवा किया जाता है फिर कुछ की आँखें फोड़ दी जाती हैं कुछ के हाथ काट दिए जाते हैं, कुछ के पैर! और फिर तेरी ही बनायी हुई क़ुदरत रहम का सहारा लेकर तेरे ही नाम पे उनसे भीख मँगवाया जाता है” “अब मैंने तुझे सब बता दिया अब तू कुछ कर! तू इन मासूम बच्चों को पहले इस क़ैद से रिहा कर! तब मैं तेरी मस्जिद में आऊँगा तेरे आगे सिर भी झुकाऊँगा अभी मुझे लगता है तू इबादत के क़ाबिल नहीं! अभी तुझको बहुत से इम्तिहान पास करने होंगे!” “हाँ, इम्तिहान से याद आया ये तूने कैसी बकवास दुनिया बनायी है? जो सिर्फ़ पैसे से चलती है?” “मुझे इस पैसे से नफ़रत है ये निज़ाम बदलने की ज़रूरत है” “तुम पहले कोई ढँग की रहने लायक़ दुनिया बनाओ फिर मुझे नमाज़ के लिए बुलाओ” “और तब तक तुम यहाँ से दफ़ा हो जाओ!!!” ***