दाएं-बाएं-बाएं-दाएं-इधर-उधर-किधर-जिधर 

अपनी मुंडी झटकाता

वो कबूतर

बार-बार उस शाम पेड़ चढ़े

सूखी टहनियां हिलाता।


बगल के कोयले तने तले

नारंगी आसमान के सामने

झड़ के नीचे आते,

जैसे बर्फ पहाड़ों की

पंख सफेद...ढेर पे ढेर,

गर्म खून की लाल लपटों में

सुगबुगाते।

तिलमिलाते जब

पीली चोंच से पटके जाते...

भूरी पंखों में झटके जाते...

कुछ कुत्ते भूखे भौंकते नीचे,

कुछ मूत के सरहद बनाते।


अपनी मुंडी झटकता

वो कबूतर

उस शाम पेड़ चढ़े,

ऊपर

नीचे

ऊपर

नीचे

ऊपर 

नीचे