घिसते नीले आसमां के नीचे

बगनबेलिया की थकी डालें...

मेरी घर की छत पर

फूलों से ढकी,

जो कभी लाल थे

अब मुरझाए, रुआँ, सफ़ेद

तूफ़ान में धुल कर,

रोज़ झड़ रहें है...

पर कुछ गाढ़े हरे पत्ते 

टहनियों की गिरी हुई चोटियों पर

अब भी लटके, टिके,

बेज़ार, नकारा, लाचार 

बहार न सही

पानी के इंतज़ार में।

और वो कबूतर भी उड़ जाता

न होता गर सब्र में बंधा

सूखे, नोकदार घोंसले से

छिपाए, सहेजे, 

अंडो के फूटने के इंतजार में।