एक पंडित

पौड़ी पर

धोता है पानी से

चारो दिशाओं में परिसर को

मूर्ति को नहलाता है

फूल बिछाता है अगल बगल

कभी झूले पर झुलाता है

कभी दूध टपकाता है

तो कभी शादी करवाता है

वो मानता है उसे सबसे बड़ा 

उससे डरता है 

लोगों को डराता है


एक बच्ची

सीढ़ी पर

धोती है पानी से

चारो दिशाओं में घर को

गुड़िया को नहलाती है

फूल बिछाती है अगल बगल

कभी झूले पर झुलाती है 

कभी दूध पिलाती है

तो कभी शादी करवाती है

वो मानती है उसे बेटी

प्यार जताती है

प्यार करवाती है