अक्सर वो आती....

लगाती बेसन चेहरे पर, गोल गोल उंगलियों को घुमाती,

पूछती "कैसी जंचती है?", जब नया कुर्ता सिलवाती,

बताती बातें दो चार...आंखों से घुसकर, ज़हन का पता लगाती,

टटोलती रखी हर चीज़ उधर, उठाती बैठाती,

मिल ना पाती अगर कोई बात, उदास हो जाती..

पर कुछ बोल ना पाती,

अक्सर वो आती....


मै काश बता पाती....

गुम हो जाती है हर वो चीज उधर, जिसकी याद नहीं आती,

उसके पास जाती, समझाती,

दे पाती गर दिलासा , उसे गले से लगाती...

"सब कुछ अब भी ठीक है!" कैसे उसे समझाती?

हटा पाती फासले, गर हिम्मत जुटा पाती...

फिर शायद शीशे की दीवार दरमियान, बाकी न रह पाती!

मै काश बता पाती....