वो कहते "खड़े हो"
हम उछल पड़ते,
वो कहते "आगे बढ़ो"
हम भाग निकलते,
वो कहते "बोलो..."
हम चिल्लाने लगते,
वो कहते "मारो"
हम बंदूक उठाने लगते...
और लगाते निशाना हर जिस्म पर
जिसका नाम कानों पड़ा है,
वो दुश्मन है मेरा...
जो मैदान के उस ओर खड़ा है!
पर ये "वो" है कौन?
मोहब्बत जिसकी ज़बां हमारी इस्तेमाल करती है...
चाले चलता जो है, पर चलते हम ही हैं...
तो गई जहां धुआं नहीं, हालात-ए-हाल से ऊपर
जो क्यों ये मैदान खाली हुआ जाता है
देखा, कि जब इधर जाम पर जाम उठे
तो नीचे चढ़े जनाज़ो पर जनाज़े...
बस दो लोगों का जश्न था!
अब एहसास होता है..
वो जो उस छोर खड़े है ना
बेशक रंग में अलग हों,
है तो लेकिन मोहरे ही...
बिल्कुल हमारी तरह!
