एक घर है जिसमें कमरें हैं

उन कमरों में एक कमरा है

उस कमरे के मै भीतर हूं।

...और भीतर हैं चार दीवारें 

एक छत भी टिकी सहारे,

जो रोज़ खिसकती जाती है,

दीवारें सिमटती जाती हैं,

मेरा लहू उबलने लगता है,

और जिस्म पे पड़ी दरारों से 

वो फटके निकलने लगता है;

मै सहमी बिलखती जाती हूं

कहीं दिख ना जाऊं, मौत के डर से

आंखे ना खोल पाती हूं।

मै खुद को दबाती जाती हूं

कहीं भीतर समाती जाती हूं...


पर ये भीतर कुछ और है,

मै दौड़ के कदम बढ़ाती हूं...

जब छूती हूं मै दीवारें तो

वो आप हवा हो जाती हैं,

जितना नापूँ इधर ज़मीं को..

हदें खिसकती जाती है..

गिरती रोशनी टुकड़े होकर

रंगों में बंट जाती है...

गले से निकली चीख सिमटकर

लहरों में बह आती है।


मै जितना भीतर जाती हूं

हवा बैठा ले जाती है,

खाली करके भरे जिस्म को

ये मुझको रुआं कर देती है...

फिर गूंज की सरपरस्ती में

ये मुझको फना कर देती है।

कोई मकसद नहीं...

कोई राह नहीं...

कोई जिस्म नहीं...

कोई चाह नहीं...

कोई दर्द नहीं...

कोई आह नहीं..