गर सवेरे से कुछ चमक चुरा पाती तो क्या था,

बेचारी शाम यूं बेउम्मीद तो ना होती!

हक तो उसे भी है किसी के ज़हन में आने का

ये नाशुक्री दुनिया तो मनाती है बस

वो कभी दिखे ही ना!


उनकी सोच ना सही काश ये दस्तूर बदल पाती

मोड़ देती घड़ियों को तो फिर क्या था,

दिन का अंधेरा वो देख पाते और 

और स्याह शाम लाल नज़र आती!!!