गर न हुई मेरी चाल में वो अदा तो अफ़सोस कैसा!?

मीलों के सफर अक्सर उसे बिगाड़ देते...


न हुई हुस्न में वो बरक्कत तो अफ़सोस कैसा!?

धूप की चमक ज़्यादा तेज होती है...


न हुई हथेलियों में वो नरमी तो अफ़सोस कैसा!?

पत्थरों का टूट पाना मुश्किल होता है..


न हुई जिस्म में वो महक तो अफ़सोस कैसा!?

आरज़ी तेज़ हवा में टिक नहीं पाए कभी...


न हुई मेरी बात में वो हया तो अफ़सोस कैसा!?

अश्लील सवालों को कद्र कहां होती है...


और इतने पर भी,

न हुई इन आंखों में वो नमी तो अफ़सोस कैसा!?

सूखा पड़े तो बूंदें बचाने में हर्ज़ क्या है?