मिरे जुनूं इतना भी का संमुदर से नूर निकलेगा । इतना भी ना -उम्मीद दिल मेरे हो। कुछ ख्वाब चंद उम्मीद क्या यही जिंदगी
हर शाम उम्मीदों में गुजर गयी" बहाना कर ऐसा कोई मिरी आस टूट जाए।
उम्मीद कहती है ठहरो जरा खत का जवाब आने दो ।
मुझे मायूस न कर मिरी आस बढ़ाकर। मुझे मेरी ख्वाहिशो का जहां बना कर तो दे । कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे,तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा।
