मोहब्बत, बेख़ुदी और दीवानगी का एक मुकम्मल जहाँ

इश्क़ जब हद से गुज़र जाए, तो जुनूँ होता है, दिल जब ख़ुद से बिछड़ जाए, तो फ़ितूर होता है। ये मोहब्बत भी अजीब कैफ़ियत रखती है, कभी दुआ, कभी दर्द, कभी अश्क़ों का सुकूँ होता है।तेरी क़ुर्बत की तलब में हम इस क़दर खो गए, अपने ही वजूद से बेख़बर हो गए। तेरी आँखों में देखा जो मोहब्बत का समंदर, हम किनारा ढूँढ़ते-ढूँढ़ते ख़ुद समंदर हो गए ।इश्क़-ए-जुनूँ का अपना ही दस्तूर होता है, यहाँ हर ज़ख़्म भी मोहब्बत का ग़ुरूर होता है।