—“दर्द-ए-मरज़”
दर्द-ए-मरज़ का इलाज़ क्या पूछते हो,
ये वो ज़ख़्म है जो दवा से नहीं, दुआ से भरता है।
लोग पूछते हैं हाल मेरा मुस्कुराकर,
कौन समझे कि दिल अंदर से कितना मरता है।
मर्ज़ भी अजीब था, दर्द भी बेहिसाब था,
जिसे चाहा वही मेरे इलाज़ का जवाब था।
मगर वो मिला नहीं उम्रभर की दुआओं में,
और ये दिल उसी के इंतज़ार में ख़राब था।
कुछ दर्द-ए-मरज़ ऐसे भी होते हैं,
जो चेहरे पर नहीं, ख़ामोशी में रोते हैं।
Dr puspa sindhu
