सोचता हूँ कि
गुजरू उन्हीं राहों से दोबारा
क्या पता कहीं पर
गुज़री हुई प्यार की
सौगातें मिल जाए
जो यादें बनकर घूमती हैं
मेरे अन्दर कहीं
क्या पता वो मुलाकातें मिल जाए
सोचता हूँ कि
गुजरू उन्हीं राहों से दोबारा
जिनमें भीगे थे हम तुम
हाथों में हाथ लिए
क्या पता फ़िर से
वही बरसातें मिल जाए
वो जो लहू से सींची
थी प्यार की बंजर ज़मी
क्या कोई अंकुर फूटा होगा
जिस तरह टूटा हूँ मैं
क्या वो शख्स भी टूटा होगा
रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह


