चले थे हम कभी
कभी चलते रहे हम
आया आज कैसा
आया आज कैसा ये पहर है
चले थे हम जहाँ से
शायद ये वही "पुराना शहर है"
कुछ अवशेष शेष हैं यहाँ पर
प्यार के बदले मिलता हैं जो द्वेष
वो द्वेष हैं यहाँ पर
आई आज कैसी
आई आज कैसी
बेरंगी ये सहर हैं
चलो दूर कही
कही दूर चलो
शायद ये वही "पुराना शहर है"
हो पात कैसी ?
हो पतवार कैसी ?
हर नदी लगती हैं सूखी
हर डाल लगती हैं सूखी
सूखी लगती हर नहर हैं
शायद ये वही पुराना शहर हैं
चलो दूर कही
कही दूर चलो
शायद ये वही "पुराना शहर है"
राह ए आबाद पर चले थे हम
फिर भी बर्बाद हुए
गिला आपसे क्या करे
शायद खुदा का बरपा
हम पर ये कहर हैं
चलो दूर कही दूर चलो
शायद ये वही "पुराना शहर हैं"
शायद ये वही "पुराना शहर हैं"
शायद ये वही "पुराना शहर हैं"
रचना:पुष्पेंद्र पाल सिंह


