निगाहें ऐसी तो नहीं
कोई भी मेरे हिसाब में
की देखे कोई तो लगे
झीलों का शहर हो आफताब में
ज़िक्र कहीं तो मिले
कभी तो मिले किसी किताब में
हाँ उनके ज़िक्र के कुछ हर्फ़ के
कुछ पन्नों मे शेष है मेरी दराज़ में
उन्मुक्त हैं वो मंत्रमुग्ध हैं वो
थोड़े से नटखट हैं मेरे अंदाज़ में
रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह


