सूरज को

हथेलियों में लिया है मैंने


ज़रा पास आओ तो

बालों में तुम्हारे सितारें सजाऊँ मैं


आचमन तेरे नाम का कर

मोहब्बत की आयतें

और प्रेम ग्रंथ तुम्हें सुनाऊं मैं


इस संवत् के ज्येष्ठ आषाढ़

जुगनुओं की नदी में

बाहें फ़ैला बहेगें दोनों


बाँध कर जुगनुओं को

अपनी पलकों के रेशों से

तेरे लिए एक ग़ज़रा बनाऊँ मैं


मोहब्बत की आयतें

और प्रेम ग्रंथ तुम्हें सुनाऊं मै


बातें होंगी जाने कैसी कैसी

हर रोज़ बहाना क्या बनाऊँ मैं


रोज़ रोज़ तेरी गली आना

मयस्सर नहीं अब मुझे

सोचता हूँ

तेरी सहेली का भाई बन जाऊँ मैं


यूँ सरेआम ना निकला करो

नज़र लग जाएगी सोहदों की

लगता है तुम्हारें घर का

शीशा भी तकता है तुम्हें


अब कोई रास्ता और

मुमकिन नहीं संवरने का

अपनी आँखों की पुतलियों से

एक पाक दिल शीशा बनाऊँ मै


रचना :-पुष्पेंद्र पाल सिंह