जीते जी

ना पढ़ा जाऊँगा मैं


बाद मरने के

कुछ ही लोगों को

याद आऊँगा मैं


तुम किनारे किनारे

खेना कश्ती अपनी


बीच मझधार जाऊँगा मैं

शब्दों में अपने, रहूँगा जिंदा मैं

लोगों के "आम" जिक्र से मिट जाऊँगा मैं


तुम पकवान बनाओ

तो मुझे याद कर लेना


पक्षी बन खा जाऊँगा मैं


रचना:पुष्पेंद्र पाल सिंह