क्या बात
तुम बिल्कुल शबाब में हो
जिसकी खुश्बू
मेरी श्वासों मे बसी है बसी
तुम उसी गुलाब में हो
रात भर जिसको
तकता रहता हूँ मैं
तुम उसी माहताब में हो
मेरी आँखों में जो हैं
अक्स बनकर घूम रहा
तुम उसी हबाब में हो
रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह


क्या बात
तुम बिल्कुल शबाब में हो
जिसकी खुश्बू
मेरी श्वासों मे बसी है बसी
तुम उसी गुलाब में हो
रात भर जिसको
तकता रहता हूँ मैं
तुम उसी माहताब में हो
मेरी आँखों में जो हैं
अक्स बनकर घूम रहा
तुम उसी हबाब में हो
रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह