चलत चलत
पैरों पड़ गए छाले
भूकंप हैं भूख का
कैसे पेट संभाले
रोटी सो एक दी ग़रीब को
बोले ज़रा फ़ोटो खिंचवा ले
लड्डू सब हैं बाँटते
पूरी सब्जी सब खाये
डकार मार मार बस
नाम धर्म को दे जाये
एक और मज़ार पे
चादर पे चादर दियो चढ़ाये
दूजी और नंगा जिस्म
बालक नन्हा
कातर को भी ललचाये
वाह रे इंसा कैसी बुद्धि तेरी
कौन तुझें समझाए
कृति:पुष्पेंद्र पाल सिंह


