कैसी बेकार ज़िद पे अड़ा हैं


तू कागज कमाने को

बस अँधा दौड़ पड़ा हैं


देख इस भागती भीड़ में

तू कहाँ खड़ा हैं


ये जो तेरी बूढ़ी माँ है ना

देख ज़रा

तेरे सामने ख़ुद हरि खड़ा हैं


सुन ओ रे पगले


ना कहीं डॉलर मे सुकून हैं

ना कोट के कॉलर में सुकून हैं

बस चैन हैं बाप की उंगली से

बस माँ की गोद में सुकून हैं


रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह