भीगे बालों में
शबाब तेरा जो निकलता हैं
हुस्न तारों का ज़रा ज़रा
पिघलता हैं
ये चंदन सा बदन
हाथ मेरा बस
लिपट लिपट लिपटता हैं
सुर्ख़ लाल होंठ तुम्हारे
जैसे सुबह का सूरज निकलता हैं
तुम चाहो तो
ग़ैर से मोहब्बत कर लो
कभी कभी, मिल लेना
जाने जा, आटे में नमक तो चलता है
रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह
