बात तेरी अब मेरे अंदर
होती रहती है
बेशक तू मत आया कर
फर्क़ क्या पड़ता हैं
कि सिंदूर
किसके नाम का है
माँग में अपनी
मेरी याद का
चन्दन लगाया कर
वो चुटकी
जो तूने घर पे
सहेली का गिफ्ट बतायी थी
उन्हें पहन कर ज़रा
मंदिर में आया कर
कोई बात नहीं
ये बात लेकिन सही
महफ़िल मे मिल ग़ैर की तरह
लेकिन अकेले में मुझे
चादर की तरह अपनाया कर
खूब मिष्ठान और
भोग खिला उनको
दूध का गिलास तू
अपने उनको पिला
जब कभी मिलूँ मै
वो अचार के साथ
लपेटे हुए परांठे
और आधा गिलास
भरके मुझे चाय पिलाया कर
रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह


