कैसा समय आ गया
मैने बुलंदी की परिभाषा
खुद ही बदल दी एक ज़माना था
जब बच्चों को विदेश
भेजकर हम सीना तान कर
कहते और अपने को कुछ खास
समझते थे इतरा इतरा कहते
नही थकते थे हमारे बच्चे
विदेश में पढ़ रहे हैं जो ना जा पता
उसे नालायक कहकर उपेक्षित
करते थे जो रह गया घरपर
वो ही कुछ कर पाया मेरे लिए
बिस्तर पर पड़कर समझ आया
वो विदेश में बैठे हैं वे आ ना सके
बीमार मां बाप को देखने
अंतिम समय में भी दर्शन हुए
तो फोन पर आँखें तरसकर
रह गई उन्हे देखने को।
पुष्पा सिंह
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