श्रृजन का शौक था

ग़फ़लत में हमने खुद उगाए

रंज भी, ग़म भी ,


वफ़ा नादानियां निकलीं

कफ़न की परवरिश

करते रहे हम भी।


ज़माना था, ज़माना है

रहेगा भी हमारा आना जाना

क्यूं नहीं समझे,


किसी की ज़िन्दगी पर

हसरतों का हक जताते

क्यूं रहे हम भी ।






- पुष्कर श्रीवास्तव अयन