कोई हमदर्द नहीं होता दीवानों के लिए

कोई आवाज़ नहीं देता वीरानों के लिए ।


सब ही करते हैं बहारों से बातें फूलों की

देखता कौनन है पतझर के निशानों के लिए ।


जिनको चाहा था उन्हें ख़ुद पे ऐतबार नहीं

क्या दुआ दूं में बिछड़ने के बहानों के लिए ।


ज़िक़्र होता है महफ़िलों में बेवफ़ाई का

फिर भीई रोकूंगा क़दम ऐसे ठिकानों के लिए ।


में सराहूंगा मोहब्बत के वफ़ाओं को भी

और इल्ज़ाम भी दूंगा में ज़मानो के लिए ।


अभी नहीं तो कभी हम भी फ़सान: होंगे

काम आयेंगे महफ़िलों में तरानों के लिए ।


- पुष्कर श्रीवास्तव