फुरसत कहाँ थी

वक्त तो खुद मेरे साथ,

मेरे खाली कमरे में

बच्चों से विछड़े हुए, कुछ टूटे हुए

खिलौने सजा रहा था ?

जिन्हें खरीदने के लिये

मेरे त्याग और पुरुषार्थ,

स्वाभिमान के साथ

आज भी खुशियां मना रहे थे।

मुझे पता था कि जब मैं अकेला रह जाऊँगा,

तब यही मुझे सांन्त्वना दैंगे।


~पुष्कर राज "पुष्कर"