जिन्दगी वक़्त, ठहर जायें, कभी मानी है

हम तो धारे हैं, निगेहवान हैं, हम पानी हैं।


गुरूर, शख्सियत, हक तू रहे तो बात रहे

क्या तुझे चाहिये, हर शै तो यहाँ फानी है।


रूह तहरीर भी लिखे, तो क्या लिखा होगा

ये कायनात उसे चार दिन निभानी है।


अगर लिखे भी गये हम कभी किताबों में

हर एक भूल, हमारे ही काम, आनी है।


सितारे बन गये आखिर कही, गनीमत मैं

फिर आफ़ताब के आगे, कहा निशानी है।


कोई रूठा भी है तुमसे, ये सोचना "पुष्कर"

अगर ख़ुदा की नहीं, किसकी मेहरबानी है।




पुष्कर श्रीवास्तव