मुझे शहर-ए-यार जब याद आता है,
मुझे कू-ए-यार भी तब याद आता है।
कू-ए-यार से जब भी गुजरता हूंँ मैं,
मुझे वो गुजरा जमाना याद आता है।
मुश्क-ए-बहार फैल जाती है फिजा में,
वस्ल-ए-यार मुझे जब याद आता है।
आब-ए-चश्म भी याद आता है मुझे,
उसका मुझे हंँसाना जब याद आता है।
शब-ए-हिज्र भी याद आता है मुझे,
वो पहला मिलन जब याद आता है।
अब और ज़िक्र-ए-यार क्या करना,
मुझे अपना सू-ए-दार याद आता है।
×××
©पुरुषोत्तम
शहर-ए-यार= प्रेमिका का शहर
कू-ए-यार= प्रेमिका की गली
मुश्क-ए-बहार= फूलों की खुशुबू
वस्ल-ए-यार=प्रेमिका से मिलन
आब-ए-चश्म= आँख का पानी, आंसू
शब-ए-हिज्र= विरह की रात
ज़िक्र-ए-यार= प्रेमिका का चर्चा
सू-ए-दार= फांसी का फ़न्दा


