मुझे शहर-ए-यार जब याद आता है,

मुझे कू-ए-यार भी तब याद आता है।


कू-ए-यार से जब भी गुजरता हूंँ मैं,

मुझे वो गुजरा जमाना याद आता है।


मुश्क-ए-बहार फैल जाती है फिजा में,

वस्ल-ए-यार मुझे जब याद आता है।


आब-ए-चश्म भी याद आता है मुझे,

उसका मुझे हंँसाना जब याद आता है।


शब-ए-हिज्र भी याद आता है मुझे,

वो पहला मिलन जब याद आता है।


अब और ज़िक्र-ए-यार क्या करना,

मुझे अपना सू-ए-दार याद आता है।

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©पुरुषोत्तम


शहर-ए-यार= प्रेमिका का शहर

कू-ए-यार= प्रेमिका की गली

मुश्क-ए-बहार= फूलों की खुशुबू

वस्ल-ए-यार=प्रेमिका से मिलन

आब-ए-चश्म= आँख का पानी, आंसू

शब-ए-हिज्र= विरह की रात

ज़िक्र-ए-यार= प्रेमिका का चर्चा

सू-ए-दार= फांसी का फ़न्दा