बहुत उलझा हुआ हूंँ जीवन चक्र में फसकर
मैने ठीक से देखा ही नहीं कभी पीछे मुड़कर
टूट गया इस बार मैंं उसके खुशी के लिए
जिसे खुद से भी ज्यादा चाहता हूंँ टूटकर
मेरी वजह से कोई और दुखी ना हो इसलिए
दोस्त हो या दुश्मन सबसे मिलता हूंँ हंँसकर
वो क्या हीं कहेगा जमाने से जो अब तक
दूसरों के खातिर जिया नहीं कभी खुलकर
जो जाने वाला है वापस कब लौटा है, उसे
आवाज लगाने वाले का गला बैठ गया चीखकर
वो रूठते तो फिर भी माना लिए जाते
इस बार रूठे हैं हमसे वो जानबूझ कर
जरूरत ऐसी चीज है जो उल्टी गंगा बहा दे
आएगा कुआं खुद प्यासे के पास चलकर
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©पुरुषोत्तम


