वो मुझसे मेरे दर्द का हिसाब मांगता है,

जिसे दाग़-ए-उल्फ़त बाद कमाया मैने।

कौन कहता है कुछ नही है मेरे घर में?

जबकि याद-ए-दोस्त घर सजाया मैंने।।

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©पुरुषोत्तम