जिस तरह चिताओं से लपटें उठ रही है,

मुल्क के शाह देख सकते आवाम तो नहीं।


नतीजा जाने बिना जो जी में आया बोल गया ,

तुम्हारी तरह मेरे मुंँह में लगाम तो नहीं।


इतना धूमधाम से जनाजा किसका निकलता है,

कोई खास ही हो सकता है आम तो नहीं।


तरक्की पर तरक्की किए जा रहे हो मियांँ,

काली करतूत छिपाने का ये इनाम तो नहीं।

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©पुरुषोत्तम