मैं तुम्हारे लिए कच्छ का रण बन जाऊं,

तुम नदी लूणी सी मुझमें गुम हो जाना।


कब तक एक दूसरे को प्रेम-पत्र लिखा जाय,

"पुरु" अब क्यों न दोनों का पता एक हो जाय।


हमारा प्रेम रसायनशास्त्र के प्रयोगशाला से शुरू हुआ था,

उस दिन मेरे दिल के बिकर में प्यार घोल गया था कोई ।

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©पुरुषोत्तम