भोर-भोर सूरज की किरणें माधुर्य लपेटे

जब मेरी प्रेयसी को छूती होगी,

सौंदर्य की मूरत से मिल रोशनी

अपने भाग्य पर कितना इतराता होगा।

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©पुरुषोत्तम