खुद के सपनो को खुद से कुचलते देखा है

लोगों को इश्क़ के आग में झुलसते देखा है


कुछ अंकुरित, कुछ हरे-भरे, कुछ मुरझाए से

स्वप्नों को कभी खिलते तो कभी मरते देखा है


मैंने तेज़ आंँधियों में भी चिराग जलते देखा है

वक्त को वक्त-वक्त पर करवट बदलते देखा है


खुद के सपनो को खुद से ही कुचलते देखा है

मैंने लोगों को इश्क़ के आग में झुलसते देखा है

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©पुरुषोत्तम