वो प्रेममय इस कदर बाहों में मिरे समाते हैं,

शायद ऐसे ही सागर गागर में समाते होंगे।


वो प्रेममय इस कदर हमसे नजरें मिलाते हैं,

शायद ऐसे हीं सूरज तपिश से जल जाते होंगे।


वो प्रेममय इस कदर यादों में आँसू बहाते हैं,

शायद ऐसे हीं मेघा अमृत बरसाते होंगे।

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©पुरुषोत्तम