रकीब का लब चूमते देख सोचा

नहीं बनना मुझे हड्डी कबाब में


पूछूंँ भी तो क्या बतलाओगे तुम?

सिर्फ हूंँ हांँ तो बोलोगे जवाब में 


तैरने की सोच कर आया था इधर

डूबना पड़ेगा यादों की सैलाब में


अंदर ही अंदर जला रहा मुझको

मेरा अश्क बदल रहा है तेजाब मेंं


"पुरु" कब्र में सोती है दुनिया सारी

आज से वो सोएगी मेरी किताब में

×××

©पुरुषोत्तम