मुदत्तों से कोई ख्वाब नहीं देखा

तुझ सा कोई गुलाब नहीं देखा


सब कहते हैं बहुत शर्मीली हो

मैने तो कोई हिजाब नहीं देखा


सुना है अथाह समंदर है आंँखें तेरी

मैने कभी कोई पंजाब नहीं देखा


गिला भी करती हो तो बड़े प्यार से

लहजे में कभी रुआब नहीं देखा


इश्क में बौराए बहुतेरे देखे मैने

किसी को इतना बेताब नहीं देखा


मैं नहीं डरता मौत से, डरे वो "पुरु"

जिसने हिज्र सा अजाब नहीं देखा

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©पुरुषोत्तम