सहम जाता हूंँ मैं बस एक ख्याल से
मेरे बगैर ना जाने वो कैसे जीती होगी।
बार-बार एक हीं सवाल पूछता हूंँ चांद से
रातों को सोती होगी या सिर्फ करवट बदलती होगी।
जब भी आती होगी उसे याद मेरी
ना जाने छिपकर वो कितना रोती होगी।
मेरा नाम लेकर सखियांँ जब छेड़ती होगी
अपने जज्बातों को कैसे वो रोकती होगी।
जैसे मैं उसकी फोटो देखता हूंँ रातभर
क्या वो भी मेरी तरह रातों को जागती होगी।
हिचकियांँ भी नहीं आती मुझे आजकल
उसे कुछ याद भी होगा या भुला चुकी होगी।
वो मेरे दिल में आज भी बसती है पहले की तरह
मैं जैसा सोचता हूंँ क्या वो भी सोचती होगी।
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©पुरुषोत्तम


