आ हीं गई तुम दो जाम आंँखों से पीलाती जाओ

अब ना तो मज़ा है ना वो नशा रहा अंगूर दाने में।


अब तो मय भी मयस्सर नहीं होता मयखाने में

जबसे नशा छिपाया तुमने आंँखों के तहखाने में।

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©पुरुषोत्तम