सुबह उठते ही काम पर लग जाती है
झाड़ू पोछा बर्तन सब निपटाती है
सबके लिए रोज नये पकवान पकाती है
और अपना खाना हमेशा भूल जाती है
पता ना चल पाये हमारी शरारतें
दुलार से हल्की डांट लगाती है
लाख गलतियों के बावजूद भी
पापा के मार से हमेशा बचाती है
मँगाने से पहले ही सारी
जरूरतें पूरी हो जाती है
खिलौने हो या नये कपड़े
सबसे पहले मेरी आती है
अपने दुखड़े वो हमसे कहां बताती है
गम भी सारे चुपचाप पी जाती है
एक खरोंच भी आ जाए मुझको
मेरे रोने से पहले उफ्फ़ माँ कर जाती है
पुरुषोत्तम


