ये जो आंँखों का लोर है न,

दरसअल रिश्तों की डोर है।


जब भी

मैं

तुमसे

दूर जाना चाहा

तुम्हारे इन

आंँसुओं ने

मुझे रोका

इनसे कहो

अपनी पकड़

ढीली कर दे

मुझे घुटन हो रही है।

×××

© पुरुषोत्तम