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किताब


उलझा रहता हूंँ किताबों के इन पन्नों में हरदम,पता नहीं कब खो जाता हूंँ तुम्हारी यादों में,फिर ध्यान आता है अपने आने वाले कल का,और मैं पुनः लौट आता हूंँ इन्हीं किताबों में।×××

© पुरुषोत्तम

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