आधी-आधी रातों को ख्वाबों में जो रोज तुम आती-जाती हो
कहती हो ये रूप-यौवन, सब शृंगार तुम्हारे हैं फिर क्यों कतराती हो
जवाब नहीं पंखुड़ियों सी इन पलकों का जो धीरे से तुम दबाती हो
पूछता हूं जब तुम्हारे मन कि होंठो पर मुस्कान और ना मे सर हिलाती हो
सच-सच कहना तुम्हारे भी नेक इरादे हैं या यूं ही तरपाती हो
@पुरुषोत्तम
