समस्याओं के बीच इस कदर उलझ गए
जो सपने थे आंँखों में कहीं गुम हो गए
जरूरत के वक्त हम साहब थे आप थे
काम निकल जाने के बाद तुम हो गए
जरूरत मुताबिक बदल जाते हैं लोग यहांँ
कांँटा से काम न बना तो ये कुसुम हो गए
सांँप और नेवला के तरह जानी दुश्मन थे
वक्त आने पर एक दूसरे के कुटुम हो गए
जितने चोर-उचक्के-बेईमान-अपराधी थे
जमाना ऐसा बदला की सब हुकुम हो गए
रैलियों में माइक पकड़ बेवजह चीखते थे
प्रश्न जब हक का पूछा तो गुमसुम हो गए
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©पुरुषोत्तम


