जीवन क्षणिक मौत शाश्वत फिर ये कैसा त्रास
जबकि इक दिन सबको बनना है इसका ग्रास।
मौत का नाम सुनकर डर जाते हैं लोग यहांँ
जीकर हीं क्या कुछ हासिल कर लिया मैंने।
मर-मरकर जीने से अच्छा है मर हीं जाएं
ऐ मौत आ तुझे हम शौक से गले लगाएं।
×××
©पुरुषोत्तम


जीवन क्षणिक मौत शाश्वत फिर ये कैसा त्रास
जबकि इक दिन सबको बनना है इसका ग्रास।
मौत का नाम सुनकर डर जाते हैं लोग यहांँ
जीकर हीं क्या कुछ हासिल कर लिया मैंने।
मर-मरकर जीने से अच्छा है मर हीं जाएं
ऐ मौत आ तुझे हम शौक से गले लगाएं।
×××
©पुरुषोत्तम