कब तक रफ्फू करता रहूंँ तुम्हें ए जिंदगी
अपनों ने हीं चीथड़ा किया है बार-बार ।
मना किया मौत भी अपनी आगोश में लेने से कहकर,
जरूरत पड़ेगी उन्हें तुम्हारी, ठहर जा और एक बार ।।
×××
© पुरुषोत्तम


कब तक रफ्फू करता रहूंँ तुम्हें ए जिंदगी
अपनों ने हीं चीथड़ा किया है बार-बार ।
मना किया मौत भी अपनी आगोश में लेने से कहकर,
जरूरत पड़ेगी उन्हें तुम्हारी, ठहर जा और एक बार ।।
×××
© पुरुषोत्तम