तलब लगी थी पीने की रात भर खाक छानता रहा।मयखाना भी मिटा ना सका तिश्नगी मेरा ।तेरे लबों को छूकर लब से, मैं लबालब हो गया ।।
तलब लगी थी पीने की रात भर खाक छानता रहा।
मयखाना भी मिटा ना सका तिश्नगी मेरा ।
तेरे लबों को छूकर लब से, मैं लबालब हो गया ।।