होली में सब मस्त हैं बचा ना कोई नर-नाड़ी।

भंगिया पी कर नाच रहे जैसे भोला भंडारी।।


भंगिया पीसत-पीसत थक गई गौरा माय।

अपने हीं धुन में कैलाशी रहे भस्म रमाय।।


इधर-उधर भटक रहे सब रंग-अबीर लगाय।

कौन राम कौन है लक्ष्मण पहचान में ना आय।।


देखो कैसे राधा को रंग लगाने ढूंढ़ रहे कन्हैया।

उसके पीछे डंडा लेकर दौड़ी यशोदा मैया।।


पीछे-पीछे दौड़े कन्हैया, आगे-आगे राधा।।

इकदुजे को रंग लगा, हुए ओतप्रोत अनुराधा।।


©पुरुषोत्तम