यह मन्दिर नहीं घर है मेरा

देवता नहीं माँ-बाप रहते है

यहांँ प्रसाद के रूप में माँ का दुलार

तो कभी पिता का प्यार मिलता है

दादा-दादी भी रहते हैं साथ मेरे

यहांँ घर का संस्कार पनपता है

सुख-शांति सबके हिस्से आता है यहांँ

और दुःख-दर्द सिर्फ बड़ों के बीच बँटता है

भाई-बहन सब संग हँसते-गाते हैं

यहांँ नौनिहालों के सपने पलते हैं

यहांँ देवता नहीं माँ बाप रहते हैं

यहांँ देवता नहीं माँ बाप रहते हैं।


©पुरुषोत्तम