एक ही शहर में रह कर हम कितना दूर हैं
इश्क के दुश्मन के आगे कितना मजबूर हैं
आज उधर है उसकी डोली उठने वाली
यहांँ हम कबसे लिए खड़ा हाथ में सिंदूर हैं
और कितना परीक्षा देते अपने इश्क का
उसके बिना भी उससे निभा रहे दस्तूर हैं
जी लेंगे तुम्हारे बिना और तुम भी जी लेना
कैसे समझाऊंँ किए गए कितना मजबूर हैं
आंँसू के सागर सुख गए हैं सारे कबके
आंँखों में जो बचा उड़ गया बन के कपूर है
एक समय था जब साथ थे हम और तुम
अब मेरे साथ तुम नहीं तुम्हारी तस्वीर है
चाहता हूंँ भूल जाऊंँ पर दिल को यकीं नहीं
क्यूंँ अब भी चढ़ा मुझपर तुम्हारा फितूर है
हक है तुमको अब भी मुझे रोकने का
जा रहा हूंँ छोड़कर दुनिया मुझमें नहीं सबूर है
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©पुरुषोत्तम


